छोटा सा ही हूं अभी, नन्हा सा...

छोटा सा ही हूं अभी, नन्हा सा...

छोटा ही हूँ अभी 
नन्हा सा
बैठा हूँ, एक कोने में चुपचाप 
तनहा सा
सोच रहा हूँ ग़लती फिर क्यूँ हुई मुझसे 
और सज़ा... ये कैसी सज़ा है...
ग़लतियाँ तो कर बैठता हूँ मैं 
लगभग रोज़ ही
क्या ऐसी सज़ा मिलेगी?
हर बार? हर ग़लती पर
मैं सोच रहा हूँ, क्या करूँ
की ग़लती हो ही ना मुझसे...
मैं गिरूँ ही ना, ताकि वो हाथ ना बढ़ें 
मुझे उठाने के लिए 
चलना ही छोड़ दूँ तो
बढ़ना ही छोड़ दूँ तो?
बस बैठा रहूँ किसी कोने में चुपचाप 
अपना कुचला हुआ दिल लेकर
नन्हा सा 
और रह जाऊँ सदा के लिए उलझा हुआ,
सूखी आँखों के आँसू मन में भरे
तनहा सा...  
 
बाल शोषण की समस्या विकराल दैत्य की तरह है. इसके कई भयावह पहलू हैं. बच्चे को भूख लगने पर खा जाने वाले पशुता से भी अधिक गर्त में जा चुकी मनुष्यता का विकराल दर्पण है बाल शोषण. एक अबोध, निश्छल बाल मन को क्रूरता के अतिरेक से छले जाने का प्रतिरूप है बाल शोषण.

कहते हैं, बचाने वाला मारने वाले से अधिक बलवान होता है. विडंबना ये है, कि यहां बचाने वाले हाथ कई बार जागरुकता के अभाव में आगे ही नहीं पाते. इस कुरूप, विकराल सामाजिक समस्या को समझेंबाल मन और बालक बालिकाओं के भविष्य पर पड़ने वाले इसके दारुण प्रभाव को भी ध्यान में रखकर बेहद सावधान रहें. शुतुरमुर्ग बन कर इसे नकार देने से यह दानव और भी अधिक शक्तिशाली होता जाएगा.