नृत्य सागर - मेरी कत्थक कक्षा को समर्पित

नृत्य सागर - मेरी कत्थक कक्षा को समर्पित

नृत्य सागर

यूं तो ये पुरानी कविता है, पर इतनी सुंदर यादों को पिरोये है, कि मन प्रसन्न कर देती है
मेरी नृत्य कक्षा के अनुपम अनुभवों को शब्दों में पिरोती...
मेरी नृत्य कक्षा को समर्पित


वाम विराजी हैं महालक्ष्मी गणपति के संग,
समकक्ष केंद्र में हैं नटराज नृत्य में मनंग,
चरणों में साजे घुंघरू बाजे हाथ में मृदंग,
सर्वोच्च सुशोभित भगवती का निराला ढंग,


पुस्तकों में सर्वोपरि है भगवद गीता मनमोहक,
और विनायक विश्राम मुद्रा में भी सम्मोहक,
रंगबिरंग कशीदाकारी से सुसज्जित गुरुस्थान,
पीतल का छोटा चिराग अनायास ही खींचे ध्यान,


वाम द्वार पर पट सुन्दर, पट पर लड़ी में पिरोकर,
नौ गज रंगबिरंग संग घुंघरू मोती मनके मनहर,
मुरलीवाला गोप और गोपी ताकें इक ओर से,
झिलमिल रंग बिखेरें दोनों बंधे हुए इक डोर से,


सारे वाद्य लगाएं इस अतुल्य सौंदर्य को चाँद चार,
सुर ताल का संगम बन बाजें पखावज और सितार,
वादक गुणीजन काठतल पर ग्रहण करें सुन्दर आसन,
भिन्न भिन्न मुद्रा में वाद्य लिए मन मोहें गजानन,


घुंघरू की झन झन झन ध्वनि से समूचा कक्ष रहे गुंजित,
नित नए बोल संगत करें छुम-तक्छुम-तक्छुम-त्रांग-तिट-किट,
विशाल दर्पण अनोखा करे मन को निराले ढंग से यूँ भ्रमित,
कि लगे आयाम संग हो रही ध्वनि भी दोगुण प्रतिबम्बित,


ज्ञान प्राप्ति में बने सहायक शिष्याओं के शुभ्र वस्त्र,
श्वेत पर निराले सजे झिलमिल चुनरियों के रंग सहस्त्र,
गुरु गौरी जिनके नाम में गुरु शब्द के अक्षर विद्यमान,
प्रदान करें सभी को कथा कहते नृत्य का श्रेष्ठ ज्ञान,


गुरु निर्देश पर नन्ही शिष्याओं के मुख से हो जब उदगार,
ताल में ध्वनित बोल जब पा जाएं सम से सम तक आधार,
तब गुरु के मुख पर देखते ही बने गौरव के भाव अपार,
प्रोत्साहन भरे शब्दों में वर्षित हो अविरल आशीषों की धार,


अरुणिम गौरी स्वयं करें जब नृत्य घुंघरू कर धारण,
तब नेत्रों संग कर्ण हो मगन ऐसा दृश्य सजे मनभावन,
कत्थक के सघन ज्ञान से परिपूर्ण गुरु ज्ञान की गागर,
गागर से हो ज्ञान वृष्टि और बने अनुपम नृत्य सागर.

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