हमारे देशवासी, “हम" देशवासी

हमारे देशवासी, “हम" देशवासी

हमारे देशवासी, “हम" देशवासी

मन लज्जित, मन दु:खी...

कल मेरा मन बहुत दु:खी हो गया.

ट्विटर पर एक कहानी के दो अलग विवरण देखते ही, मैंने सही, प्रामाणिक सूचना हेतु केवल १ मिनट दिया.

जो जाना उससे संतोष कम हुआ, दु:ख ज़्यादा हुआ.

कई कारण हो सकते हैं, केजरीवाल को पसंद न करने के. कई कारण हो सकते हैं, कुमार विश्वास को वंशवाद का विनाश करने के लिए विश्वसनीय न समझने के.
और कारण, मत, विचार अलग हो कर भी अपनी अपनी जगह सही हो सकते हैं.

लेकिन क्या बस ये कारण काफी हैं अपने देशवासियों से नफरत करने के लिए??
आम आदमी पार्टी में कमियां सही, उसका नेतृत्व आपको नापसंद सही, उसके समर्थक आपको पागल (आपटर्ड शब्द का प्रयोग किया जा रहा है) क्यों लगते हैं?
और चलो दीवाने तो दीवाने सही, पर चाहते तो आपके देश का भला ही हैं... हमारे देश का उत्थान ही हैं...

नौकरी छोड़ देश के लिए धूप, धूल, मिट्टी, और अब तो घूंसे लाते भी खाकर, खून पसीना एक करने वालों पर प्रेम छोड़ो, हमारे मन में सद््भाव भी नहीं?

सिर्फ इसलिए कि वो हमारी राजनीतिक राय से मेल नहीं रखते, हम उनके बुरी तरह पिटने, लहुलुहान होने पर, कान का पर्दा फटते फटते बचने पर तो चुप, लेकिन जैसे ही कोई बुरी खबर उनके बारे में मिले, उस खबर का सांच झूठ परखे बिना उसको साझा करना शुरू, उसपर टिप्पणियां करना शुरू, ऐसे “बुरे” लोगों की पिटाई होने पर अपनी खुशी जाहिर करना शुरु कर देते हैं?? ये नहीं सोचते, कि बाद में सच सामने आने पर भी जाने कितने लोगों की गलत राय बरकरार रहेगी? किसी के मान सम्मान का, उसकी सच्चाई का हमारे लिए कोई मोल नहीं?

मुझे बहुत शर्म आ रही है... कि “हम” ऐसे हैं.

हमारे प्रेम-सद््भाद रहित मन जैसी...

जब छोटी थी, देशभक्ति के निबंध बहुत चाव से लिखती थी. और शुरू करती थी, “अनेकता में एकता, ये हिंद की विशेषता.”

तब पढ़ते थे, कि अंग्रेजों ने जाते जाते जाति के नाम पर हमें विभाजित कर दिया, तो कितना गुस्सा आता था.

लेकिन आज हम अपने ही अहम् के नाम पर, अपने द्वारा अच्छे राजनेता माने जाने वाले के नाम पर, उसके विजयरथ को “रोकने” की कोशिश करेने वालों को मूर्ख समझने के नाम पर,
खुद फूट डाल हैं... अपने ही मन में, अपने लोगों में??

जहां केवल नापसंदगी, केवल असहमति काफी है, वहां घृणा के, ऐसी बेमतलब, बेवजह नफरत के बीज क्यों बोते हैं?

जब कभी कुछ दिनों के लिए विदेश गई, तो मैंने अपने देश को, देशवासियों को बहुत ही याद किया.
दो दिन में ही लगता था, कि वापस चला जाए.

दो तीन हफ़्ते के काम के बाद, वापसी के समय पोलेंड एअरपोर्ट पर एक भारतीय परिवार को देख कर... बस मन खुश हो गया. कोई जानपहचान नहीं, उनसे बात भी नही हुई, बस जाने क्यों, उनके बच्चों में उत्साह देखकर, मेरा गला स्वदेश की याद से रूंधने लगा.
वो पल भूल नहीं पाती हूं.

ये पल भी नहीं भूल पाउंगी.

बस फर्क इतना है, कि उस पल में, मीठी यादों की कसक थी, अपने देश लौटने का उतावलापन भी था, उत्साह भी, खुशी भी... अपने लोगों में लौटने की... अपने जैसे लोगों में लौटने की.
और इस पल में... दु:ख है. मलाल है.. अफसोस है.

मुझे वाकई बहुत शर्म आ रही है... कि “हम” ऐसे हैं.

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