सास, बहु और... ज़हर!

सास, बहु और... ज़हर!

आज मैंने एक कहानी पढ़ी. इतनी मूर्खता भरी थी कि मन किया सिर पर हाथ दे मारूं. 

हां तो जी, कहानी में एक तो थी बहु, तो ज़ाहिर है सास भी होगी ही. वो ही, घिसा पिटा, नई सोच, पुरानी सोच, लड़ाई और ताने. 

पर जी इतने से पेट नहीं भरा कहानी कहने वाले का. बहु अलग नहीं होना चाहती थी, वो तो मार देना चाहती थी सास को. सो अपने पिता से जाकर ज़हर देने का “हठ” करने लगी, सास को मारने के लिए. 

तो ये तो थी उसकी नए ज़माने की सोच. ये जो कहानियां बनाते हैं, खुद मंदबुद्धि होते हैं, कि लोगों को निपट मूर्ख समझते हैं भई? 

नए ज़माने की सोच थी, तो बात करती सास से, उनको प्यार से समझाने की कोशिश करती. उनसे कहती, मैं आपके बेबात के ताने नहीं सहूंगी. मेरी गलती हो, तो आप ज़रूर डांटें मुझको. पर कोशिश करके दूसरों के सामने मेरा सम्मान रखें. और फिर भी ना फायदा होता, तो अपने पति से बात करती. या सास से अलग हो जाती, और दूर रहकर उनके सुख दुख में शामिल रहती, या पति ना मानता और बहुत ही असह्य स्थिति हो जाती, तो तलाक के विषय में सोचती.

ना जी, ये सभ्रांत महिला पिता से सास को जान से मार देने के लिए जहर की पुड़िया मांगने पहुंच गई. फिर? पिता को क्या करना चाहिए था? बेटी तो क्रिमिनल मांइडसेट, यानि की, आपराधिक प्रवृत्ति का परिचय दे रही है. 

एक चांटा मार सकते थे, बेटी किसी वजह से होश खो बैठी हो, तो होश में आ जाएगी. फिर ना मानती, तो काउंसलर के पास ले जाते, पहले इस मूर्खता का इलाज होता, फिर बेटी को इस स्थिति में लाने वालों की खोज खबर ली जाती. या सास और पति को समझाया जाता, कि मानसिक रूप से कमज़ोर पुत्री को विशेष रूप से प्रेम से रखना होगा. वे समझ पाते और तैयार होते तो ठीक, अन्यथा तलाक ही विकल्प के रूप में सामने होता. 

परंतु, नहीं नहीं, यहां पिता ने ज़हर दे दिया बेटी को. पुड़िया बनाकर, एक चुटकी रोज़ का प्रिस्क्रिप्शन तय हुआ. और बेटी भी मान गई. अब ये महान पिता की महान महिला चलीं ससुराल. जहां “बुद्धिमान” पिता की सलाह अनुसार, सास के तानों का जवाब नहीं दिया. फिर क्या हुआ? बस सास सुधर गई… ओ नहीं, वो तो पहले ही भली थी, पुरानी सोच के चलते ताने मारती थी ना. गलती तो बहु की थी, वो जवाब देती क्यों थी नालायक? सब सुन कर चुप रहना चाहिए. 

क्या हुआ जो गीता में लिखा है, कि शोषण सहने वाला शोषण करने वाले जितना ही दोषी होता है? सास भी कभी बहु का शोषण करती है क्या? वो तो मां है. ये दीगर बात है, कि ऐसी ऐसी स्वार्थी माताएं होती हैं, कि बहु ही नहीं वो बेटे का भी शोषण कर सकती हैं. पर ये हमारा यथार्थ है. इस तरह की कहानियां बुनने वाले एक काल्पनिक समाज का सपना बनाकर एक संकीर्ण सोच के गुब्बारे में जीते हैं. 

Saas-Bahu Aur Zahar
सिर्फ हर रिश्ता नहीं, हर रिश्ते का हर दिन अलग होता है. अलग संभावनाएं, अलग निराशाएं, अलग भावनाएं… पर हमारे कहानीकार महाशय से सबको बंडल में बांधने की ठानी है. 

हां जी तो चलो, जिन जिन घरों में सास बहु की नहीं बनती, सब को डालों बंडल में — पुराने ज़माने की सास के ताने, और नए ज़माने की सोच. रुक मेरे हाथ, अभी अपने सिर के बाल मत नोच. पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त.

तो सास का हृदय परिवर्तन हुआ, अब बहु का होना ही है. क्या है कि, नए ज़माने की सोच के कारण भटक गई थी, बस मर्डर ही तो करने वाली थी, बाकी लड़की अच्छी थी. 

अब कुछ दिन में सास मरने वाली थी, हां, टोटल ट्रांसफोर्मेशन, यानि की, पूर्ण परिवर्तन में पूरे छः महीने लग गए. अब पिता डॉक्टर थे, सोच समझ कर प्रिस्क्रिब्शन लिखा था भई. 

पर देखो, छः महीने पूरे हुए नहीं थे. दवा का असर जल्दी हो गया, और अपना परिवर्तित, कोमल, निश्छल, करुणा का भंडार बना हृदय लेकर हत्यारिन बेटी पिता के पास पहुंची. उसने मांगा एंटीडोट, यानि ज़हर का असर खत्म करने की दवाई. क्योंकि अब वो सास को मां की तरह प्यार करने लगी थी. ताने गॉन, मॉम यू आर ऑन. अब भविष्य में फिर ताने मारने लगी, तो फिर ये मोहतरमा धीमे ज़हर की पुड़िया चुनेंगी, या इस बार कोई शॉर्टकट?  

पिता ने मारा एंटीजोक, कि ज़हर थोड़ी ना, वो तो हाजमे का चूरण था. 

एंटीजोक शब्द पर ध्यान दें. क्योंकि क्या है ना, ये हमने बनाया है, बस अभी अभी. एंटीजोक मतलब जोक का दुश्मन. 

मने बेवकूफ हो क्या? एक तो ऐसी बेटी को ससुराल भेज दिया वापस, जो पुलिस के खुद को और अपने ही पिता को पकड़ के ले जाने की चेतावनी के बाद भी सास को मारना चाहती थी. फिर कहानीकार ये भी चाहता है, कि हम मान लें, कि अब पुरानी सोच और नई सोच के बीच कोई फ्रिक्शन यानि टकराव नहीं होगा. और ये भी कि हम हंसेंगे.

पर बिटिया तो पाप की भागी बन गई डॉक्टर साहब. अपने पति, अपने जीवनसाथी की जीवनदायिनी मां को मारने का भाव लेकर वह चार-पांच महीने तक चुपचाप मन ही मन खुश होती रही. 

घर परिवार की लड़ाइयां विचलित कर सकती हैं. तो क्या मारने का विचार आना ठीक है? कोई कुविचार पल भर को अनचाहे आया और हमने उसे झटक दिया, तो चलो ठीक, पर उस विचार पर विचारणीय चर्चा करने पिता के पास पहुंच कर उसे अंजाम देने की कोशिश करने वाला इंसान क्या मानसिक रूप से स्वस्थ है? समाज में रहने लायक है? 

क्या? ये तो बस कहानी थी? और केवल सीख पर ध्यान देना था? कि सास की सेवा करो, तो वो मां बन जाएगी? ऐसा होता है क्या?

मरने मारने की बातें क्यों? बहु का ये वीभत्स चित्रण क्यों? क्या बहुएं ऐसी होती हैं? होनी चाहिए? और क्या एक पिता को ऐसा होना चाहिए? ऐसी सीख? ऐसा ज़रिया?
ऊपर से ऐसा सामान्य हो जाना सबकुछ? मानो ये सब तो बहुत आम सी, रोज़ मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा है? सीख देने का कोई और तरीका क्यों नहीं मिला? क्योंकि नए ज़माने की अत्याचार न सहने वाली बहुएं आपके पास विकल्प नहीं छोड़ रहीं?


अगर सामान्य महिला इस तरह सोच रखने को मजबूर हो जाए, तो उसकी सास क्या सामान्य है? ऐसा रिश्ता सहेजने योग्य है? 

बहु बेटी नहीं बन पाती. क्योंकि बेटी का अपना स्थान होता है. ऐसे ही सास मां ना बन पाए तो क्या हुआ? क्या अपने पति की मां के रूप में सम्मान देकर एक सामान्य संबंध नहीं बन सकता? ये अतिशियोक्तियां क्यों?  

कहानियां ही समाज और जीवन का दर्पण नहीं होती. कई बार, जीवन और जीवित मनुष्य कहानियों से प्रेरणा पाकर अपने जीवन में परिवर्तन की नींव रख लेते हैं. 

तो हे कहानीकार… कृपया सास बहु की कहानियां लिखना बंद कर दें. आप मर्डर मिस्ट्री यानि हत्या व हत्यारों की कहानियां और उनके विषय में लिखें. वो क्या है ना, जितनी सहजता से हत्या का प्रयोजन आपकी “नायिका” के मन में आया, व जिस गरिमा के साथ उसने इस प्रयोजन को सिद्ध करने हेतु प्रयास किया, उस से हमको लगता है, आप हत्यारों का मानस बहुत अच्छा वर्णित करेंगे.