हस्तलिखित

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लेखन की विधा का अनूठा सौंदर्य.

कॉलेज के समय की बात है. "एक सहपाठी के गृहकार्य को देख कर शिक्षिका ने कहा, ये तुमने खुद नहीं किया, बताओ किसकी नक़ल उतारी है?"

तब बढ़ा अचरज हुआ था. अब तो बढ़ी ही सीधी सी बात लगती है, कि नक़ल उतार कर किये गए लेखन के अविलम्बित प्रवाह को मूल कार्य से विलग पहचानना एक अनुभवी शिक्षिका के लिए क्या बढ़ी बात है. उन्होंने तो तुरंत समझ लिया कि ये सोच सोच कर, रुक रुक कर स्वयं किया गया कार्य नहीं है. 

इसी तरह लिखित सामग्री में कहीं कहीं भाव भी उजागर हो जाते हैं. जैसे क्रोध से उबलते हुए अगर कोई पत्र लिखे तो किंचित अधिक दवाब से अक्षर कागज़ पर गाढ़े हुए से नज़र आएँगे. या जल्दबाजी में लिखा हुआ हो तो कुछ कटा-पिटा सा होगा.

पत्र व्यवहार तो अब किसी विगत युग की बात है, पर अगर किसी के पत्रों को पढ़ते रहे हों, तो उसके लिखे अक्षर आपको उसकी मनोस्थिति का आभास भी करा सकते हैं. आप जान लेंगे कि शब्दों में अभिव्यक्त भाव के अतिरिक्त लिखने वाले के मन में लिखते समय ढेर सारी ख़ुशी है, या वो कोई चिंता पाले है.

टाइप किये हुए अक्षरों से सुंदर, साफसुथरा सा लेखन होगा, पर हस्तलिखित लिपि का मूल भाव कहां? मन से सीधा अक्षरों में उतरा और उन्हें विविध स्वरुप देता भाव कहीं खो जाता है. तकनीकी एकरसता के कारण एक अक्षर एक ही सा नज़र आएगा. 

पर आज की दौड़ती भागती सी ज़िन्दगी में, लेखन का समय किसी के पास नहीं. डिजिटल युग में हस्ताक्षर भी डिजिटल हैं... कौन जाने, भविष्य में लेखन की विधा विलुप्त ही हो जाए.